आज कई भारतीय पुरुष शादी से क्यों बच रहे हैं?
आज के भारत में कई पुरुष शादी से पीछे क्यों हट रहे हैं? आधुनिक भारत में बदलते विवाह के चलन के पीछे मौजूद सांस्कृतिक, आर्थिक, भावनात्मक और सामाजिक कारणों को समझें।
CULTURE


भारत में शादी हमेशा से समाज की सबसे अहम परंपराओं में से एक रही है। यह सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं माना जाता था, बल्कि दो परिवारों का जुड़ाव समझा जाता था। शादी को पवित्र बंधन माना जाता था, जिससे परिवार आगे बढ़ता था और समाज में स्थिरता बनी रहती थी। पहले ज़्यादातर शादियाँ परिवार तय करता था। उस समय लड़के-लड़कियों की पसंद से ज़्यादा परिवार की सहमति, समाज और रिश्तों को महत्व दिया जाता था। कम उम्र में शादी करना ज़रूरी और सही माना जाता था। लेकिन अब समय बदल रहा है और खासकर युवा पुरुष शादी को जीवन का ज़रूरी कदम नहीं मान रहे हैं।
पिछले कुछ सालों में भारतीय पुरुषों की सोच में साफ बदलाव दिख रहा है, खासकर शहरों और कस्बों में। आज बहुत से पुरुष शादी को टाल रहे हैं या करना ही नहीं चाहते। वे पहले पढ़ाई पूरी करना, करियर बनाना और खुद को मजबूत बनाना चाहते हैं। आज के समय में नौकरी और पैसा कमाना इतना मुश्किल हो गया है कि शादी उन्हें एक अतिरिक्त ज़िम्मेदारी लगने लगी है। पहले शादी से जीवन में स्थिरता आती थी, लेकिन आज पुरुष शादी से पहले स्थिर होना चाहते हैं। इसी वजह से शादी की उम्र बढ़ती जा रही है और जल्दी शादी करने की सोच कम होती जा रही है।
दुनिया से जुड़ाव, अलग-अलग तरह की ज़िंदगी देखने का मौका और मोबाइल व इंटरनेट ने भी सोच बदल दी है। आज के पुरुष जानते हैं कि रिश्ते निभाने के और भी तरीके हैं। लिव-इन रिलेशनशिप, जिसे पहले गलत माना जाता था, अब धीरे-धीरे स्वीकार की जा रही है। बहुत से लोग इसे शादी से पहले एक-दूसरे को समझने का तरीका मानते हैं, ताकि बिना किसी दबाव के रिश्ता निभाया जा सके। अब रिश्ता निभाने में रस्मों से ज़्यादा आपसी समझ और सम्मान को महत्व दिया जा रहा है।
पैसे की चिंता भी शादी से दूर रहने की बड़ी वजह है। आज भी कई जगह दहेज जैसी प्रथाएँ मौजूद हैं, जो मानसिक और आर्थिक दबाव बनाती हैं। इसके अलावा शादियाँ बहुत महंगी हो गई हैं। बड़े समारोह, कई कार्यक्रम और समाज को दिखाने का दबाव बहुत खर्चा करवा देता है। ऊपर से महंगाई, नौकरी की अनिश्चितता और भविष्य की चिंता—इन सबके कारण पुरुष पहले अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा होना चाहते हैं, फिर शादी के बारे में सोचते हैं।
इसके साथ ही पुरुष और महिलाओं की भूमिकाएँ भी बदल रही हैं। अब पुरुष से सिर्फ कमाने की उम्मीद नहीं की जाती, बल्कि उनसे भावनात्मक समझ, घर के काम में मदद और बराबरी की भागीदारी भी चाही जाती है। ये बदलाव अच्छे हैं, लेकिन कई पुरुषों को समझ नहीं आता कि उनसे क्या उम्मीद की जा रही है। परंपरागत सोच और आधुनिक सोच के बीच फँसकर उन्हें डर लगता है कि कहीं वे शादी में असफल न हो जाएँ।
मानसिक कारण भी अहम हैं। बहुत से पुरुष शादी को अपनी आज़ादी खत्म होने से जोड़कर देखते हैं। आसपास के दुखी रिश्ते, बढ़ते तलाक और समाज का दबाव उन्हें डराता है। आज की डेटिंग संस्कृति, जहाँ रिश्ते आसानी से बनते और टूटते हैं, शादी की ज़रूरत को और कम कर देती है। जब बिना शादी के भी रिश्ता संभव है, तो शादी ज़रूरी क्यों लगे?
सोशल मीडिया भी इस सोच को बढ़ाता है। वहाँ हर कोई खुश, सफल और परफेक्ट रिश्ता दिखाता है, जिससे असली ज़िंदगी कम अच्छी लगने लगती है। पुरुषों को लगता है कि शादी से पहले उन्हें एक खास स्तर हासिल करना होगा, जो अक्सर मुश्किल होता है। इसलिए वे इंतज़ार करना या अकेले रहना बेहतर समझते हैं।
आगे आने वाले समय में शादी खत्म नहीं होगी, लेकिन उसका रूप ज़रूर बदलेगा। अब शादी को मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी का फैसला माना जा रहा है। आज भी बहुत से पुरुष साथ, प्यार और लंबे रिश्ते को महत्व देते हैं, लेकिन वे यह सब बिना दबाव और दिखावे के चाहते हैं। जैसे-जैसे समाज बदल रहा है, शादी भी आपसी समझ और सम्मान पर आधारित एक नया रूप ले सकती है। इन बदलती सोच को समझना और स्वीकार करना ही आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।