भारत में देर से शादी करने वाले और अविवाहित युवाओं की संख्या क्यों बढ़ रही है?
देर से शादी करने की प्रवृत्ति, बाल विवाह में कमी और व्यक्तिगत पसंद की बढ़ती आज़ादी भारत और भारतीय युवाओं में हो रहे प्रगतिशील बदलाव को दर्शाती है |
CULTURE


पिछले कुछ दशकों में भारतीय युवाओं का शादी को लेकर नजरिया काफ़ी बदल गया है। यह बदलाव सिर्फ़ व्यक्तिगत पसंद का नतीजा नहीं है, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। आज के भारतीय युवा शादी को पहले की तरह जीवन का अनिवार्य पड़ाव नहीं मानते, बल्कि इसे एक ऐसा विकल्प समझते हैं जो उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर तैयारी पर निर्भर करता है। इसी कारण कई युवा शादी को टाल रहे हैं और कुछ तो शादी न करने का फैसला भी कर रहे हैं।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की “Youth in India Report 2022” के अनुसार, 15–29 वर्ष की आयु के अविवाहित युवाओं की संख्या 2011 में लगभग 17.2% थी, जो 2019 तक बढ़कर करीब 23% हो गई। आँकड़ों के अनुसार अविवाहित पुरुषों का प्रतिशत 20.8% से बढ़कर 26.1% हो गया, जबकि महिलाओं में यह 13.5% से बढ़कर 19.9% तक पहुँच गया। इसका मतलब है कि लगभग हर चार में से एक युवा या तो शादी देर से कर रहा है या शादी से पूरी तरह दूरी बना रहा है। यह बदलाव दर्शाता है कि अब शिक्षा, करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता को जल्दी शादी से ज़्यादा महत्व दिया जा रहा है।
शादी की औसत उम्र भी लगातार बढ़ रही है। महिलाओं के लिए पहली शादी की औसत उम्र 2005–06 में लगभग 17.4 वर्ष थी, जो 2019–21 तक बढ़कर 19.7 वर्ष हो गई। पुरुषों में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिला है। बाल विवाह में भी बड़ी गिरावट आई है। 1992–93 में जहाँ लगभग दो-तिहाई महिलाएँ 18 वर्ष से पहले शादी कर लेती थीं, वहीं 2019–21 तक यह संख्या घटकर 23.2% रह गई। शिक्षा ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। जिन महिलाओं ने 12 या उससे अधिक साल की पढ़ाई की है, वे कम पढ़ी-लिखी महिलाओं की तुलना में औसतन 5–6 साल देर से शादी करती हैं।
युवाओं के शादी टालने या अविवाहित रहने के पीछे कई कारण हैं। शिक्षा सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है, क्योंकि यह न सिर्फ़ ज्ञान देती है बल्कि आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और सही निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करती है। जहाँ पहले की पीढ़ियाँ पढ़ाई पूरी होते ही शादी कर लेती थीं, वहीं आज के युवा पहले खुद को पढ़ाई और करियर में स्थापित करना चाहते हैं। सर्वे बताते हैं कि पढ़ी-लिखी महिलाएँ शादी में जल्दबाज़ी नहीं करतीं और परिवार या समाज के दबाव के बजाय आपसी समझ और समान सोच को प्राथमिकता देती हैं।
आर्थिक दबाव भी इस देरी को बढ़ा रहा है। शादी, उससे जुड़े समारोह, घर बसाने और बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ बड़ा आर्थिक बोझ बन गई हैं। महँगाई, शहरी जीवन की लागत और नौकरी की अनिश्चितता के कारण युवा मानते हैं कि शादी से पहले आर्थिक रूप से स्थिर होना ज़रूरी है। इसके साथ ही व्यक्तिगत आज़ादी, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर भी युवा सोच-समझकर कदम उठा रहे हैं।
सांस्कृतिक और सामाजिक सोच में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले जहाँ शादियाँ ज़्यादातर पारिवारिक निर्णयों पर आधारित होती थीं, आज युवा आपसी समझ, समान लक्ष्य और मानसिक मेल को ज़्यादा महत्व देते हैं। शादी अब केवल परंपरा निभाने का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि एक सोच-समझकर लिया गया व्यक्तिगत फैसला बन चुकी है। क़ानूनी सुधारों और जागरूकता अभियानों ने भी बाल विवाह और कम उम्र की शादियों को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है, जिससे लड़कियों को पढ़ाई और करियर के बेहतर अवसर मिले हैं।
आज के युवा शादी से पहले आत्मनिर्भरता, व्यक्तिगत आज़ादी और आत्म-खोज को महत्व देते हैं। वे पहले यह समझना चाहते हैं कि वे क्या चाहते हैं, उनका करियर क्या होगा और जीवन के लक्ष्य क्या हैं। इसके बाद ही वे जीवनसाथी चुनने का फैसला करते हैं। इस सोच ने सामाजिक दबाव को कम किया है और व्यक्तिगत पसंद को ज़्यादा महत्व दिया है।
इन बदलावों का असर साफ़ दिख रहा है। अविवाहित युवाओं की संख्या बढ़ रही है, शादी की उम्र बढ़ रही है और बाल विवाह कम हो रहे हैं। इससे महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के बेहतर अवसर मिल रहे हैं। आज के युवा शादी को मजबूरी नहीं, बल्कि अपनी तैयारी और इच्छा से जुड़ा निर्णय मानते हैं।
हालाँकि, इन बदलावों के साथ कुछ चुनौतियाँ भी हैं। पारंपरिक परिवार संरचना में बदलाव, अकेलापन और भावनात्मक सहयोग की कमी जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं। आज़ादी बढ़ी है, लेकिन रिश्तों, पैसों और ज़िम्मेदारियों को संभालने की समझ भी उतनी ही ज़रूरी हो गई है। संतुलन बनाए रखना बेहद अहम है।
कुल मिलाकर, भारतीय युवाओं का शादी को लेकर नजरिया समाज में हो रहे बड़े बदलावों को दर्शाता है। आज शादी को सामाजिक दबाव नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, समझ और साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षा, करियर, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आज़ादी अब शादी के फैसले का केंद्र बन चुके हैं।
यह बदलाव काफी हद तक सकारात्मक है। इससे युवाओं को सोच-समझकर फैसले लेने की ताक़त मिलती है, बाल विवाह कम होते हैं और लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलता है। हालाँकि, परिवार और समाज को भी बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना होगा।
आज के युवा शादी को नए तरीके से परिभाषित कर रहे हैं जहाँ प्यार, समझ और तैयारी, दिखावे और सामाजिक दबाव से ज़्यादा मायने रखते हैं। देर से शादी, बाल विवाह में कमी और व्यक्तिगत पसंद की बढ़ती आज़ादी यह दिखाती है कि भारतीय समाज एक प्रगतिशील दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहाँ बराबरी, सोच-समझकर लिए गए फैसले और व्यक्तिगत अधिकारों को महत्व दिया जा रहा है।