छत्तीसगढ़ की धान मंडियों में घोटाला, व्यवस्था की लापरवाही और किसानों के साथ अन्याय
छत्तीसगढ़ की धान मंडियों में सामने आ रही अनियमितताएं, रिकॉर्ड में हेराफेरी और प्रशासनिक लापरवाही किसानों के साथ बड़े अन्याय को उजागर करती हैं। यह ब्लॉग धान खरीदी व्यवस्था में फैले घोटाले और सिस्टम की कमजोरियों पर गंभीर सवाल उठाता है।
1/30/20261 मिनट पढ़ें


छत्तीसगढ़ की धान मंडियां लंबे समय से अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतों से घिरी हुई हैं। कागजों में सब कुछ नियमों के अनुसार चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। इस तस्वीर के जरिए साफ संकेत मिलता है कि धान खरीदी की पूरी प्रक्रिया में अनुशासन, पारदर्शिता और जिम्मेदारी की भारी कमी है। मंडी व्यवस्था किसानों की मदद के लिए बनाई गई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह कुछ लोगों के लिए कमाई का जरिया बनती जा रही है।
धान खरीदी के दौरान सबसे बड़ी समस्या रिकॉर्ड में होने वाली हेराफेरी की है। कई मामलों में वास्तविक मात्रा और दर्ज की गई मात्रा में बड़ा अंतर पाया जाता है। किसानों के नाम पर धान दिखाकर भुगतान निकाल लिया जाता है, जबकि असली किसान को या तो कम भुगतान मिलता है या फिर लंबा इंतजार करना पड़ता है। यह पूरा खेल मंडी स्तर पर सक्रिय नेटवर्क के जरिए चलता है, जिसमें बिचौलिये, कर्मचारी और प्रभावशाली लोग शामिल होते हैं।
मंडी में कामकाज की प्रक्रिया में भारी लापरवाही देखी जाती है। टोकन व्यवस्था, वजन प्रक्रिया और एंट्री सिस्टम में स्पष्टता नहीं होने के कारण किसान भ्रम और असमंजस की स्थिति में रहता है। कई बार एक ही धान को बार-बार दिखाकर कागजों में खरीदी दर्शा दी जाती है, जिससे सरकारी राशि का दुरुपयोग होता है। जांच के नाम पर औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती हैं, लेकिन वास्तविक दोषियों तक कार्रवाई नहीं पहुंच पाती।
धान घोटाले का सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। समय पर भुगतान न मिलना, बार-बार मंडी के चक्कर लगाना और अधिकारियों की उदासीनता किसान को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ देती है। सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य किसानों के लिए राहत होना चाहिए था, लेकिन सिस्टम की खामियों के कारण वही समर्थन मूल्य उनके लिए तनाव का कारण बन जाता है।
यह तस्वीर मंडी व्यवस्था की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करती है। अगर सब कुछ नियमों के अनुसार हो रहा होता, तो इतनी अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने नहीं आतीं। हर साल जांच रिपोर्ट आती हैं, घोटालों की चर्चा होती है, लेकिन सुधार के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलते हैं। जब तक मंडी स्तर पर सख्त निगरानी, पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था और दोषियों पर सीधी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
छत्तीसगढ़ की धान मंडियां सिर्फ खरीद केंद्र नहीं, बल्कि लाखों किसानों की उम्मीद का केंद्र हैं। इन केंद्रों पर हो रही लापरवाही और घोटाले किसानों के भरोसे को तोड़ते हैं। अब समय आ गया है कि इस व्यवस्था को दिखावे से बाहर निकालकर जमीनी स्तर पर सुधारा जाए, ताकि किसान को उसका हक मिले और धान खरीदी प्रणाली पर जनता का भरोसा वापस लौट सके।