काग़ज़ों पर विकास, जमीनी स्तर पर संघर्ष: असली प्रगति कहाँ है?
भारत की आर्थिक बढ़त से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन असली तरक़्क़ी सिर्फ़ GDP और आँकड़ों में नहीं होती। सच्चा विकास तब होता है जब लोगों को साफ़ हवा, सुरक्षित पानी, पौष्टिक भोजन और बेहतर जीवन गुणवत्ता मिलती है। यह लेख इसी सवाल को उठाता है कि क्या हमारा विकास सच में ज़मीन पर दिख रहा है या सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित है।
ECONOMY


दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत का शामिल होना हमारे आधुनिक इतिहास का एक बड़ा पड़ाव है। यह कई दशकों की मेहनत, सुधारों, नवाचार और करोड़ों लोगों के रोज़मर्रा के प्रयासों का नतीजा है। इतनी तेज़ आर्थिक बढ़त देश के अंदर और बाहर दोनों जगह भरोसे का संकेत देती है। यह दिखाती है कि भारत में क्षमता है, दिशा है और आगे बढ़ने की इच्छा है। लेकिन इतिहास यह भी सिखाता है कि आर्थिक उछाल कोई अंतिम मंज़िल नहीं होता। यह एक ऐसा मोड़ होता है जहाँ यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि विकास का असली मतलब क्या है और इसका फायदा वास्तव में किसे मिल रहा है।
आर्थिक प्रगति को आमतौर पर आँकड़ों से मापा जाता है, उत्पादन, आय, निवेश और बाज़ार का आकार। ये आँकड़े ज़रूरी हैं क्योंकि इन्हीं से नीतियाँ बनती हैं और योजनाएँ तय होती हैं। लेकिन आँकड़े ज़िंदगी की पूरी सच्चाई नहीं दिखाते। वे इंसानों के अलग-अलग अनुभवों को औसत में बदल देते हैं। आम लोग विकास को ग्राफ़ या रैंकिंग से नहीं महसूस करते। वे उसे उस हवा से महसूस करते हैं जो वे साँस में लेते हैं, उस पानी से जिसे वे पीते हैं, उस खाने से जो उनकी थाली में आता है, और उस सुरक्षा से जो उनके आसपास होती है। अगर ये बुनियादी चीज़ें कमजोर हैं, तो आर्थिक सफलता अधूरी लगती है।
असली विकास की घोषणा नहीं होती, उसे महसूस किया जाता है। जब लोगों का स्वास्थ्य धीरे-धीरे बेहतर होता है, जब रोज़मर्रा की ज़िंदगी आसान बनती है और जब बुनियादी ज़रूरतों को लेकर डर कम होता है, तब विकास सच्चा लगता है। आर्थिक बढ़त इस बदलाव की संभावना बनाती है, लेकिन सिर्फ़ संभावना काफ़ी नहीं होती। अगर इस बढ़त को लोगों की भलाई में नहीं बदला गया, तो समृद्धि कुछ इमारतों और काग़ज़ों तक सीमित रह जाती है।
हवा की गुणवत्ता विकास को परखने का सबसे साफ़ पैमाना है। हवा सबके लिए एक जैसी होती है अमीर-गरीब का फर्क नहीं करती। जब हवा ज़हरीली होती है, तो उसका असर बच्चों, बुज़ुर्गों और कामकाजी लोगों सभी पर पड़ता है। तेज़ शहरीकरण, बढ़ते वाहन, बिना योजना का निर्माण और उद्योगों से निकलता धुआँ हवा को नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसके नतीजे धीरे-धीरे सामने आते हैं साँस की बीमारियाँ, थकान और कम होती उम्र। अगर विकास साँस लेने तक को मुश्किल बना दे, तो उस पर दोबारा सोच ज़रूरी है।
पानी भी यही कहानी बताता है। सभ्यताएँ हमेशा पानी के आसपास फली-फूली हैं और पानी की खराब व्यवस्था से ही गिरावट शुरू हुई है। नदियाँ, झीलें और भूजल यह दिखाते हैं कि हम प्रकृति के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। प्रदूषण और ज़्यादा दोहन ने पानी को दुर्लभ बना दिया है। जब लोगों को सुरक्षित पानी के लिए उबालना या खरीदना पड़े, तो यह साफ़ संकेत है कि आर्थिक ताक़त और ज़मीनी सुविधाओं में दूरी है। साफ़ पानी कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि सम्मान और स्वास्थ्य की बुनियाद है।
खाद्य सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। मज़बूत अर्थव्यवस्था का मतलब यह होना चाहिए कि लोगों को सुरक्षित और पोषक भोजन मिले। लेकिन मिलावट और गुणवत्ता को लेकर डर बना रहता है। यह डर रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करता है, खासकर उन परिवारों को जिनके पास विकल्प कम होते हैं। सिर्फ़ खाना उपलब्ध होना काफ़ी नहीं, उस पर भरोसा भी होना चाहिए।
इन्फ्रास्ट्रक्चर को अक्सर विकास का सबसे बड़ा सबूत माना जाता है सड़कें, रेलवे, घर और डिजिटल नेटवर्क। लेकिन ये तभी सफल हैं जब ये लोगों की ज़िंदगी को सुरक्षित और आसान बनाएं। अगर सड़कें तेज़ तो बनें लेकिन हादसे बढ़ें, शहर बारिश में डूब जाएँ, या तकनीक सबको शामिल न कर पाए, तो विकास अधूरा है। असली इन्फ्रास्ट्रक्चर वह है जो भरोसेमंद और सुरक्षित हो।
असल में, आर्थिक विकास एक साधन है, लक्ष्य नहीं। इसका मक़सद लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बनाना है। स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा विकास के बाद आने वाले फायदे नहीं हैं, बल्कि उसकी नींव हैं। बीमार और असुरक्षित समाज लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकता।
शहर विकास के केंद्र होते हैं, लेकिन अगर योजना के बिना फैलें तो असमानता और प्रदूषण बढ़ाते हैं। जाम, गंदगी और महँगा आवास मजबूरी नहीं, बल्कि गलत फैसलों का नतीजा हैं। जो शहर सार्वजनिक परिवहन, हरियाली और स्वच्छता को प्राथमिकता देते हैं, वे दिखाते हैं कि विकास और बेहतर जीवन साथ चल सकते हैं।
ग्रामीण भारत भी उतना ही ज़रूरी है। वही हमारा भोजन, संसाधन और संतुलन देता है। अगर गाँवों में पानी, स्वास्थ्य और रोज़गार नहीं होंगे, तो विकास एकतरफ़ा रह जाएगा और पलायन बढ़ेगा।
टिकाऊ विकास तय करता है कि यह प्रगति कितने समय चलेगी। पर्यावरण को नुकसान लंबे समय में बड़ी समस्याएँ खड़ी करता है। प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करना रुकावट नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा है।
शासन व्यवस्था की भूमिका बेहद अहम है। साफ़ हवा, सुरक्षित पानी और स्वास्थ्य से जुड़े नियम यह दिखाते हैं कि प्राथमिकताएँ क्या हैं। जब शासन पारदर्शी और ज़िम्मेदार होता है, तो विकास सबका साझा प्रयास बनता है।
निजी क्षेत्र की भी ज़िम्मेदारी है। स्वच्छ तकनीक, नैतिक व्यापार और सुरक्षित काम का माहौल न सिर्फ़ समाज बल्कि कारोबार के लिए भी ज़रूरी है।
समुदाय और आम लोग भी विकास को दिशा देते हैं। जब लोग स्वच्छता, सही उत्पाद और स्थानीय भागीदारी को महत्व देते हैं, तो विकास मज़बूत होता है।
शिक्षा इस पूरे बदलाव की कुंजी है। यह लोगों को जिम्मेदारी से सोचने और संसाधनों की क़द्र करना सिखाती है।
तकनीक सही दिशा में इस्तेमाल हो तो विकास को तेज़ और समावेशी बना सकती है। चुनौती यह है कि वह सबके लिए काम करे।
आख़िर में, विकास का मक़सद रैंकिंग बढ़ाना नहीं, बल्कि गरिमा और सुरक्षा से भरी ज़िंदगी देना है। जब साँस लेना आसान हो, ज़िंदगी सुरक्षित हो और भविष्य भरोसेमंद लगे, तभी प्रगति सच्ची होती है।
जो देश सिर्फ़ आँकड़ों पर खुश हो जाए और बुनियादी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करे, वह अर्थ समझे बिना गति को विकास मान लेता है। लेकिन जो देश आर्थिक ताक़त को इंसानी भलाई से जोड़ देता है, वही टिकाऊ और सच्ची तरक़्क़ी करता है।